बॉम्बे हाई कोर्ट: बैंक ऑफ बड़ौदा धोखाधड़ी मामले में अंबानी को अंतरिम राहत नहीं, ओशिवरा के भूमि अधिग्रहण को झटका, ट्रेन से घायल यात्री को मुआवजे का निर्देश

बैंक ऑफ बड़ौदा धोखाधड़ी मामले में अंबानी को अंतरिम राहत नहीं, ओशिवरा के भूमि अधिग्रहण को झटका, ट्रेन से घायल यात्री को मुआवजे का निर्देश
  • अंबानी की याचिका पर तत्काल सुनवाई से भी इनकार
  • अदालत से राज्य सरकार के मुंबई के ओशिवरा की 2738 स्क्वायर मीटर भूमि अधिग्रहण को लगा बड़ा झटका
  • अदालत ने ट्रेन से गिरकर घायल हुए यात्री को मुआवजा देने का रेलवे प्रशासन को दिया निर्देश

Mumbai News. हाई कोर्ट ने बैंक ऑफ बड़ौदा से संबंधित धोखाधड़ी मामले में अनिल अंबानी को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने उनकी याचिका पर तत्काल सुनवाई से यह देखते हुए इनकार कर दिया कि यह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उन्हें समानांतर कानूनी रास्ते अपनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। अदालत की पीठ के समक्ष अनिल अंबानी की याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि दूसरे बैंकों को एसबीआई के लिए तैयार की गई ऑडिट रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और उन्हें उस रिपोर्ट या उससे जुड़े दस्तावेजों तक पहुंच नहीं दी गई थी। याचिका का विरोध करते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा की ओर से पेश वकील ने कहा कि इसी तरह के मुद्दे पहले की सुनवाई में भी उठाए जा चुके हैं कि अलग-अलग बैंकों के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) समेत जांच एजेंसियां भी शामिल है। बैंक की दलीलों से सहमत होते हुए पीठ ने कहा कि अंबानी को कई अलग-अलग कानूनी रास्ते अपनाने के बजाय अपनी याचिका वापस ले लेनी चाहिए थी। पीठ ने यह भी साफ कर दिया कि उन्हें कोई अंतरिम सुरक्षा नहीं दी जाएगी और उन्हें राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला रखा है। यह मामला सितंबर 2025 का है, जब बैंक ऑफ बड़ौदा ने कथित धोखाधड़ी वाले लोन अकाउंट को लेकर अंबानी के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी। यह कार्रवाई भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व वाले बैंकों के एक समूह के लिए बीडीओ द्वारा किए गए एक फॉरेंसिक ऑडिट पर आधारित थी। इसके बाद कई बैंकों ने अनिल अंबानी और उनकी कंपनियों से जुड़े बैंक अकाउंट को ‘धोखाधड़ी' की श्रेणी में डाल दिया है।

अगर सरकार सिर्फ कागज पर जमीन अपने नाम कर असल में कब्जा न ले, तो जमीन मालिक का हक बना रहता है...

बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के मुंबई के ओशिवरा की 2738 स्क्वायर मीटर भूमि के अधिग्रहण को लेकर बड़ा झटका लगा है। अदालत ने 20 साल चली कानूनी लड़ाई में भूमि के मूल मालिक के वारिसों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर सरकार सिर्फ कागज पर जमीन अपने नाम कर ले, लेकिन असल में कब्जा न ले और बीच में कानून (यूएलसी एक्ट) खत्म हो जाए, तो जमीन पर मालिक का हक बना रहता है। न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की पीठ ने कहा कि 73 वर्षीय मैथिल्डा जॉन कार्लोस समेत अन्य भूमि मालिक वारिसों की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि जमीन का राज्य सरकार में निहित होना सुरक्षित रखना है, तो सरकार को यह दिखाना होगा कि मूल अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार जमीन का कब्जा सरकार द्वारा 29 नवंबर 2007 से पहले ले लिया गया था। राज्य सरकार को धारा 10(5) के तहत कब्जे के स्वैच्छिक समर्पण या धारा 10(6) के तहत जबरदस्ती बेदखली को साबित करना होगा। ऐसे सबूत के अभाव में जमींदार निरसन अधिनियम की धारा 3 के तहत लाभ का दावा करने का हकदार है। पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (हरी राम केस) के अनुसार केवल सरकारी नाम दर्ज होना पर्याप्त नहीं है। धारा 10(5) और 10(6) का पालन अनिवार्य है। इसके लिए 30 दिन का नोटिस देना जरूरी था। यहां नोटिस की सही सेवा साबित नहीं हुई और 30 दिन की नोटिस अवधि का उल्लंघन हुआ है। सरकार की ओर से 6 अक्टूबर 2006 को नोटिस भेजा गया था और 3 नवंबर 2006 को भूमि पर कब्जा कर लिया गया था। पूरा 30 दिन का समय नहीं दिया गया। इसलिए वास्तविक कब्जा साबित नहीं हुआ है। कोई ठोस प्रमाण नहीं कि जमीन वास्तव में ली गई। रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि सक्षम प्राधिकारी अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार याचिकाकर्ताओं को नोटिस की तामील (सेवा) साबित करने में विफल रहा है। सक्षम प्राधिकारी का कब्जा केवल प्रशासनिक या कागजी कब्जा प्रतीत होता है, जिससे यह साबित नहीं होता कि जमीन मालिकों से जमीन का वास्तविक भौतिक कब्जा लिया गया था।

घबराहट में ट्रेन से उतरने की कोशिश करना स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है, इसे स्वयं की गलती से चोट नहीं कहा जा सकता

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक यात्री की ट्रेन से गिरकर घायल होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि घबराहट में ट्रेन से उतरने की कोशिश करना स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है, इसे स्वयं की गलती से चोट नहीं कहा जा सकता है। अदालत ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण ने उसका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह अप्रिय घटना नहीं है, बल्कि यात्री की स्वयं की गलती से चोट लगने की घटना है। न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने नासिक के येवला निवासी रोहिदास बंदू कुमावत की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि भले ही यात्री दरवाजे के पास हो या गलत ट्रेन में चढ़ा हो, चलती ट्रेन से गिरना सामान्यत:‘अप्रिय घटना’ माना जाएगा। इस घटना में मुआवजा मिलेगा, जब तक कि स्पष्ट रूप से आत्म-प्रेरित चोट साबित न हो। पीठ ने याचिकाकर्ता को 80 हजार रुपए मुआवजा 6 फीसदी वार्षिक ब्याज के साथ घटना की तारीख से भुगतान तक रेलवे प्रशासन को 12 सप्ताह में भुगतान करने का निर्देश दिया है। इस मामले में पीठ ने अपने फैसले में यात्रियों को सलाह दी कि उन्हें गलत ट्रेन में चढ़ने पर चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगला स्टेशन आने तक इंतजार करना चाहिए। याचिकाकर्ता गुवाहाटी एक्सप्रेस ट्रेन से यात्रा कर रहा था और जलगांव स्टेशन के पास ट्रेन से उतरने की कोशिश में गिरकर घायल हो गया। उसने रेलवे दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे के दावा किया, तो न्यायाधिकरण ने 31 जनवरी 2018 को उसका दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह अप्रिय घटना नहीं है। यह स्वयं की गलती से घायल हुआ।

Created On :   25 March 2026 9:12 PM IST

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