सन्मार्ग माइंड वेलनेस: टीवी और गूगल के भरोसे छोड़े जा रहे बच्चे, नई पीढ़ी होती जा रही अकेली - मोहन भागवत

टीवी और गूगल के भरोसे छोड़े जा रहे बच्चे, नई पीढ़ी होती जा रही अकेली - मोहन भागवत
  • टीवी और इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता के कारण नई पीढ़ी धीरे-धीरे एकाकी होती जा रही है
  • पहले बच्चों को दादी-नानी की कहानियों से जीवन के संघर्षों का सामना करने की प्रेरणा मिलती थी

Nagpur News. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि टीवी और इंटरनेट पर बढ़ती निर्भरता के कारण नई पीढ़ी धीरे-धीरे एकाकी होती जा रही है। पहले बच्चों को रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथों के अध्ययन और दादी-नानी की कहानियों से जीवन के संघर्षों का सामना करने की प्रेरणा मिलती थी, लेकिन अब यह परंपरा कमजोर पड़ रही है।

रविवार को नागपुर में ‘सन्मार्ग माइंड वेलनेस’ के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आज माता-पिता बच्चों को टीवी और ‘गूगल बाबा’ के भरोसे छोड़ रहे हैं। इससे बच्चों के व्यक्तित्व और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज छोटी-छोटी असफलताओं से निराश होकर विद्यार्थी आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। बारहवीं में असफल होने या घर में डांट पड़ने जैसी घटनाओं के बाद बच्चों का घर छोड़ देना चिंताजनक है।

इस स्थिति को बदलने के लिए नई पीढ़ी के साथ संवाद बढ़ाना और उनके मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाना जरूरी है। पूरी दुनिया अब मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को समझ रही है, जबकि भारतीय परंपरा में मन के महत्व पर प्राचीन काल से जोर दिया गया है। वर्तमान में देश में पश्चिमी देशों से आए मनोविज्ञान का अधिक अभ्यास किया जाता है, लेकिन वह पूरी तरह परिपूर्ण नहीं है।

फ्रायड और एडलर जैसे मनोवैज्ञानिकों के सिद्धांतों पर आज भी बहस जारी है। भारतीय ग्रंथों में मन की गहन और समग्र समझ मौजूद है। ‘योगवासिष्ठ’ और ‘पतंजलि योगसूत्र’ मन के अध्ययन के श्रेष्ठ ग्रंथ हैं। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों को आधुनिक मनोविज्ञान के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन जोड़कर एक विकसित भारतीय मनोविज्ञान तैयार करना चाहिए, जो दुनिया को नई दिशा दे सके।

बदलती जीवनशैली पर जताई चिंता

भागवत ने कहा कि बदलती जीवनशैली के कारण लोगों की आत्मनिर्भरता भी कम होती जा रही है। आईटी क्षेत्र में कमाई के लिए पति-पत्नी दोनों के कार्यरत रहने के कारण घर में भोजन बनाने के बजाय बाहर से खाना मंगाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे लोग अनजाने में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक आदतों को अपना रहे हैं।

पहले घरों में पापड़, अचार जैसी चीजें तैयार की जाती थीं, लेकिन अब यह परंपरा समाप्त होती जा रही है। यदि समाज को आत्मनिर्भर बनाना है तो इसकी शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर से करनी होगी।

आज बच्चों के रोने पर उन्हें समझाने के बजाय सीधे मोबाइल फोन थमा दिया जाता है। यह प्रवृत्ति भविष्य के लिए चिंता का विषय है और परिवारों को इस दिशा में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है।

Created On :   5 July 2026 8:35 PM IST

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